सतगुरु ने चादर धोई रे सिंगाजी

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

सतगुरु ने चादर धोई रे, सतगुरु ने चादर धोई रे,

जेको भेद नी जान्यो कोई रे, सतगुरु ने चादर धोई रे.....

बिना सोडो और बिना साबुन से,

जेने बिना नीर से धोई रे, सतगुरु ने चादर.....

ढाई बरष की झोट कुंवारी,

जेने बिना ब्याही खे दुही रे, सतगुरु ने चादर.....

बिना दीपक और बिना दिवला से,

जेने जोत में जोत जलाई रे, सतगुरु ने चादर.....

कहे जन दल्लू सुनो रे भाई साधु,

गुरु ने धरम धजा लहराई रे, सतगुरु ने चादर......

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।