मेरे सतगुरु झालो दे रहे

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

मेरे सतगुरु झालो दे रहे,

अमृत के भरे भंडार, पिया चलो पीते चलो हो रही......

देखो गुरुमुख गुरुमुख पी गए,

निर्गुण को सूखे सागर ताल, भागो चलो भागो चलो हो रही,

मेरे सतगुरु झालो दे रहे,

भोजन के भरे भंडार, खाते चलो खाते चलो हो रही.....

देखो गुरुमुख गुरुमुख खा गए,

निर्गुण को ना बचे बासे दूर, भागो चलो भागो चलो हो रही,

मेरे सतगुरु झालो दे रहे,

कमरों की लगी है कतार, सोते चलो सोते चलो हो रही.....

देखो गुरुमुख गुरुमुख सो रहे,

निर्गुण को मिली नहीं छोड़, भागो चलो भागो चलो हो रही,

मेरे सतगुरु झालो दे रहे,

कपड़े के भरे भंडार, पहनो चलो पहनो चलो हो रही.....

देखो गुरमुख गुरमुख पहन रहे,

निर्गुण को बचे नहीं चीर, भागो चलो भागो चलो हो रही,

मेरे सतगुरु झालो दे रहे,

देखो ज्ञान के भरे भंडार, लेते चलो लेते चलो हो रही.....

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।