भरोसे थारे चाले जी सतगुरु म्हारी नांव

संत कबीर
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॥ पावन पाठ ॥

भरोसे थारे चाले जी, सतगुरु म्हारी नांव,

सतगुरु मारी नाव दाता, धनगुरु म्हारी नांव,

भरोसे थारे चाले जी, सतगुरु म्हारी नांव.....

नही है हमारे कुटम्ब कबीलो, नही हमारे परिवार,

आप बिना दूजा नही जग में, नहीं हैं तारणहार,

भरोसे थारे चाले जी, सतगुरु म्हारी नांव.....

भवसागर उंडा घणा जी, जाऊं मैं परली पार,

निगाह करू तो नज़र ना आवे, भवसागर की धार,

भरोसे थारे चाले जी, सतगुरु म्हारी नांव.....

डूबया जहाज समुन्द्र में गहरी, किस विध उतरु पार,

काम क्रोध मगरमच्छ डोले, खावण ने तैयार,

भरोसे थारे चाले जी, सतगुरु म्हारी नांव.....

सत्संग रूपी नांव बनाऔ , इस विध उतरो पार,

ज्ञान बादली सूरत चली हैं, सेवक सिरजण हार,

भरोसे थारे चाले जी, सतगुरु म्हारी नांव......

कहत कबीर सुणो भाई साधो, मैं तो था मझधार,

रामानंद मिल्या गुरु पूरा, कर दिया बेड़ा पार,

भरोसे थारे चाले जी, सतगुरु म्हारी नांव......

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।