सच्चा प्यार गुरुदेव का

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

गुरू चरणाँ विच सच्चा प्यार करना कोई-कोई जाने,

गुराँ दी सेवा ते सतकार करना कोई कोई जाने,

चाकर बन गुरू सेवा करना, गुरू घर दा नित पानी भरना,

पहुँच के सतगुराँ दे दरबार संवरना कोई-कोई जाने,

गुरू चरणाँ विच सच्चा प्यार करना.....

मन तो आपा भाव मिटाना, दुई द्वैत नूँ दिलों भुलाना,

लैंदे ने मन अपने नूँ मार मरना कोई-कोई जाने,

गुरू चरणाँ विच सच्चा प्यार करना.....

बुल्ले रूठड़ा पीर मनाया, चाकर कन्जराँ दा कहलाया,

पीर मुरशिद नूँ राजी यार करना कोई-कोई जाने,

गुरू चरणाँ विच सच्चा प्यार करना.....

धूनी लाके दर ते बैणा, हस हस जग दे ताने सेहना,

"प्रेम" कई डुबे विच मंझदार तरना कोई-कोई जाने,

गुरू चरणाँ विच सच्चा प्यार करना.....

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।