हार श्रृंगार करां दाती दा

पारंपरिक
माता दुर्गा भजन दुर्गा भजन durga
॥ पावन पाठ ॥

हार श्रृंगार करां दाती दा, हार श्रृंगार करां दाती दा,

मै रज रज दर्शन पावां, मैं नचदी नचदी आवां,

हार श्रृंगार करां दाती दा.....

किन्नी सोहणी लगदी माँ दी मुरत,

दिल विच वसदी एहो सूरत,

रात विरात माँ दर्शन देवे,

जो होवे दिल विच ओ ही माँ देवे,

जदो बुलावे अम्बे रानी,

जदो बुलावे अम्बे रानी, मैं सिर ते बल चल आवां,

मैं नचदी नचदी आवां,

हार श्रृंगार करां दाती दा......

दर मैनु माँ दा लगे बड़ा प्यारा,

रूप मैया दा सब तो न्यारा,

चरणा दे विच किथे गंगा वगदी,

शेर दी सवारी बड़ी प्यारी प्यारी लगदी,

पा के दर चिर आ जगदम्बे,

पा के दर चिर आ जगदम्बे, मैं क्यो ना शुक्र मनावां,

मैं नचदी नचदी आवां,

हार श्रृंगार करां दाती दा......

ऊँचेया पहाड़ा ते महामाया,

विच गुफा दरबार सजाया,

ज्योत तेरी दिन राती जगदी,

सबदे दिला नु रोशन करदी,

कोई ना खाली जावे दर तो,

कोई ना खाली जावे दर तो, मैं वी मुरादा पावां,

मैं नचदी नचदी आवां,

हार श्रृंगार करां दाती दा......

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।