शिव शिव रट ले रे बन्दे

पारंपरिक
महादेव भजन शिव भजन shiv
॥ पावन पाठ ॥

शिव शिव शिव शिव रट ले रे बन्दे,

जीवन है ये थोड़ा आ आ,

शिव शिव शिव शिव रट ले रे बन्दे,

जीवन है ये थोड़ा,

दौड़ा जाये रे समय का घोड़ा,

दौड़ा जाये रे समय का घोड़ा,

शिव शिव शिव शिव रट ले रे बन्दे,

जीवन है ये थोड़ा,

शिव शिव शिव शिव रट ले रे बन्दे,

जीवन है ये थोड़ा,

दौड़ा जाये रे समय का घोड़ा,

दौड़ा जाये रे समय का घोड़ा,

ना मेरा ना तेरा बाबू,

इस घोड़े पर प्रभु का काबू,

ना मेरा ना तेरा बाबू,

इस घोड़े पर प्रभु का काबू,

ना मेरा ना तेरा बाबू,

इस घोड़े पर प्रभु का काबू....

परमपिता ही इसे चलाता,

परमपिता ही इसे चलाता,

दिखा दिखा कर कोड़ा,

दौड़ा जाये रे समय का घोड़ा,

दौड़ा जाये रे समय का घोड़ा,

शिव शिव शिव शिव रट ले रे बन्दे,

पल पल बीत रही ज़िन्दगानी,

कल की चिंता कर ले रे प्राणी,

पल पल बीत रही ज़िन्दगानी,

कल की चिंता कर ले रे प्राणी,

पल पल पल पल पल पल पल पल,

पल पल बीत रही ज़िन्दगानी,

कल की चिंता कर ले रे प्राणी,

ना जाने कब टूट पड़े ना जाने कब टूट पड़े,

माथे पे काल हथौड़ा,

दौड़ा जाये रे समय का घोड़ा,

दौड़ा जाये रे समय का घोड़ा......

दसों दिशाओं के दरवाज़े,

कहते रोज़ बजाकर बाजे,

दसों दिशाओं के दरवाज़े,

कहते रोज़ बजाकर बाजे,

दसों दिशाओं के दरवाज़े,

बात इस नाश्वान शरीर की चल रही है,

प्राण कहाँ से निकलेंगे,

किसी को कुछ मालूम नहीं,

किसी कवि ने बहुत अच्छी बात लिखी है,

कि रंग महल के दस दरवाज़े,

ना जाने कौन सी खिड़की खुली थी सईयां निकल गये,

( सईयां याने प्राण ) सईयां निकल गये मैं ना लड़ी थी,

यह शरीर ही वोह रंग महल है जिस में दस दरवाज़े है,

प्राण कहाँ से निकलेंगे किसी को कुछ मालूम नहीं है……

दसों दिशाओं के दरवाज़े,

कहते रोज़ बजाकर बाजे,

दसों दिशाओं के दरवाज़े,

कहते रोज़ बजाकर बाजे,

बता ये दुनिया वाले तूने,

बता ये दुनिया वाले तूने,

कितना पुण्य है जोड़ा,

दौड़ा जाये रे समय का घोड़ा,

दौड़ा जाये रे समय का घोड़ा…..

शिव शिव शिव शिव शिव शिव शिव शिव शिव,

शिव शिव शिव रट ले रे बन्दे जीवन है ये थोड़ा,

शिव शिव शिव शिव रट ले रे बन्दे,

जीवन है ये थोड़ा,

दौड़ा जाये रे समय का घोड़ा,

दौड़ा जाये रे समय का घोड़ा,

दौड़ा जाये रे समय का घोड़ा……

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।