बूरबक बनावेल ना आवे ल दशहरे में

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॥ पावन पाठ ॥

सब कमी बाटे सईया जान तानी तहरे में,

बूरबक बनावेल ना आवे ल दशहरे में,

हमके फसाव तार बात के ककहरे में,

बूरबक बनावेल ना आवे ल दशहरे में.....

लाले लाले आँख कके, ताके ली बईठ के,

देलो परसादी अम्मा फेंक देली छींट के,

भोरे भोरे फूल लावे जाई जब बाहरा,

घरवा देवरा लगाई देला लहरा,

कहतारे ससुर जी की चल जाना सहरे में,

बूरबक बनावेल ना आवे ल दशहरे में.....

बोले खाती बोली सभे खोजेला बहाना,

कही के बझिनिया मारे लोग ताना,

रजऊ राकेश बोल कहवा हम जाई,

तहरा के दुःख आपन केतना बताई,

एकरा से नीमन रही पापा जी के पहरे में,

बूरबक बनावेल ना आवे ल दशहरे में....

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।