जय जय प्रभु दीनदयाल हरे

पारंपरिक
श्री कृष्ण भजन कृष्ण भजन krishna
॥ पावन पाठ ॥

गोविंद हरे गोपाल हरे,

जय जय प्रभु दीनदयाल हरे,

मैने अन्न के दान पंडित को दिए,

एकादशी के बराबर वह भी ना हुए,

जय जय प्रभु दीनदयाल हरे....

मैंने गाय के दान पंडित को दिए,

एकादशी के बराबर वह भी ना होए,

जय जय प्रभु दीनदयाल हरे....

मैं गंगा जमुना त्रिवेणी नहाई,

एकादशी के बराबर वह भी ना होए,

जय जय प्रभु दीनदयाल हरे....

मैंने चार धाम की यात्रा करी,

एकादशी के बराबर वह भी ना हुए,

जय जय प्रभु दीनदयाल हरे....

मैंने बेटी के दान जमाई को दिए,

एकादशी के बराबर वह भी ना हुए,

जय जय प्रभु दीनदयाल हरे....

मैंने सावन के महीने तुलसा सीची,

एकादशी के बराबर वह भी ना हुए,

जय जय प्रभु दीनदयाल हरे....

मैंने कार्तिक मास तुलसा पूजी,

एकादशी के बराबर वह भी ना हुए,

जय जय प्रभु दीनदयाल हरे....

मैंने तुलसा विवाह शालिग्राम से किया,

एकादशी के बराबर वह भी ना हुए,

जय जय प्रभु दीनदयाल हरे....

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।