लगी रेहनी तेरे नाल दातया

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॥ पावन पाठ ॥

तेरे असि, तेरा दाता, तेरा दिता खाने आ,

लख लख दाता तेरा शुकर मनाने आ,

रखे साडा तू ख्याल दाताया, की जिह्ना चिर साह चलदे,

लगी रेहनी तेरे नाल दातया, जिह्ना चिर साह चलदे.....

साडी कामयाबी विच दाता तेरा हथ वे,

पूरियां हमेशा दाता किती साडी आस वे,

वींगा होया नहीं बाल दाताया, की जिह्ना चिर साह चलदे,

लगी रेहनी तेरे नाल दातया, जिह्ना चिर साह चलदे.....

लिखदा है दाता साडे हथा दी लकीरा नु,

पला च जगाया साडी सूती तकदीरा नु,

हल किते तू सवाल दातया, की जिह्ना चिर साह चलदे,

लगी रेहनी तेरे नाल दातया, जिह्ना चिर साह चलदे.....

डुबदे बेड़े नू साडे दित्ता तू सहारा जी,

तुहाडी किरपा नाल सानू दिसिया किनारा जी,

साडा बनाया मलाह दातया, की जिह्ना चिर साह चलदे,

लगी रेहनी तेरे नाल दातया, जिह्ना चिर साह चलदे.....

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।