नचणा ज़रुर चाहिदा

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

होया खुशियाँ दा आज वे माहोल,

नचणा ज़रुर चाहिदा,

साडी गुरा नाल बंधी हुई डोर,

नाचना जरुर चाहिदा.....

सोहना सोहना सतगुरु आसन लगाया मैं,

चुन चुन फुल्ला नाल उस नु सजाया मैं,

बड़ी शरदा नाल पुरे किते शोंक, सतगुरू घर आ गए,

ऐना वरगा ना कोई होर,

सतगुरु घर आ गए.....

सोणे हारावाले दी चाल निराली ऐ,

सिर ते रुमाल गल, फुल्ला वाली माला ऐ,

ऐदे दर्श पावा हाथ जोड़,

सतगुरु घर आ गए.....

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।