उड़ जायेगा हंस अकेला

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

गुरुजी मन मिले का मेला रे उड़ जायेगा हंस अकेला....

चारों और बाग लगवाएं,

प्रभु जी बीच लगा दिए केला रे, उड़ जायेगा हंस अकेला.....

कोड़ी कोड़ी माया जोड़ी,

संग चले ना दे लारे, उड़ जायेगा हंस अकेला.....

क्यों करता है मेरा मेरा,

प्रभुजी चिड़िया रैन बसेरा रे, उड़ जायेगा हंस अकेला.....

कागज की एक नाव बनाई,

प्रभु जी छोड़ गई मत धारा रे, उड़ जायेगा हंस अकेला....

धर्मी धर्मी पार उतर गई,

प्रभु जी पापी गोत बसेरा रे, उड़ जायेगा हंस अकेला.....

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।