भोले पर्वत की ऊंची चढ़ाई रे

पारंपरिक
महादेव भजन शिव भजन shiv
॥ पावन पाठ ॥

भोले पर्वत की ऊंची चढ़ाई रे,

मैं तो तेरे दर्शन को आई रे....

मैं तो जल भर कलसा लाई रे,

झाड़ों में ईलझ गई साड़ी रे,

सांप बिच्छू ने ऐसी डर आई रे,

मेरी गगरी छलक टी आई रे,

भोले पर्वत की ऊंची चढ़ाई रे,

मैं तो तेरे दर्शन को आई रे....

मैं तो चंदन केसर लाई रे,

समसानो को देख घबराई रे,

भूत प्रेतों ने ऐसी डराई रे,

मेरी केसर बिखरती आई रे,

भोले पर्वत की ऊंची चढ़ाई रे,

मैं तो तेरे दर्शन को आई रे....

मैं तो भंगिया घोट कर लाई रे,

तेरे द्वारे पर नंदी बैठी पाई रे,

नंदी ने मोहे समझाई रे,

भोले बाबा ने समाधि लगाई ले,

भोले पर्वत की ऊंची चढ़ाई रे,

मैं तो तेरे दर्शन को आई रे....

मैं तो हार गूथकर लाई रे,

भोले बाबा के गले पहनाई रे,

भोले बाबा ने पलके उठाई रे,

शिव गोरा के दर्शन पाई रे,

भोले पर्वत की ऊंची चढ़ाई रे,

मैं तो तेरे दर्शन को आई रे....

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।