एक हार गुलाब का लाई हूँ

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

तर्ज - बड़ी दूर से चलकर आया हूं

एक हार गुलाब का लायी हूँ, बाबोसा तेरे दरबार में,

तेरे दर्शन को मैं आई हूँ, संग ले सारा परिवार मैं....

ना धन दौलत न माया है, न कोई मोटर कार है,

मैं पैदल पैदल आयी हूँ, बाबोसा तेरे प्यार में,

एक हार गुलाब का लायी हूँ....

ना कुबेर का धन चाहूं मैं, ना इच्छा है मुझे शोहरत की,

हो तेरी एक नजर बस, काफी है इस स्वार्थ के संसार मे,

एक हार गुलाब का लायी हूँ....

प्राची की तमन्ना है "दिलबर" अब लौट के में ना जाऊँगी,

चरणों मे तेरे गुजरे जीवन, बस करती रँहु दीदार मैं,

एक हार गुलाब का लायी हूँ....

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।