क्या सोच करे पागल मनवा

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॥ पावन पाठ ॥

क्या सोच करें पागल मनवा,

जो बीत गया सो बीत गया,

इस झूठे खेल में, मूल्य ही क्या,

कोई हार गया कोई जीत गया,

क्या सोच करे पागल मनवा.....

हम चाहे वही हो जरुरी नहीँ,

आशाएँ कभी हुई पूरी कहीं,

रे सोच तनिक जीवन घट का,

श्वाँसा जल कितना रीत गया,

क्या सोच करे पागल मनवा.....

प्रभु प्रेम पियूस पिया जिसने,

परहित हित जन्म लिया जिसने,

जीवन है वही जो जन जन के,

मृदु अधरों का बन मीत गया,

क्या सोच करे पागल मनवा....

जब सूर्य सा साथी मिलता है,

राजेश कमल तब खिलता है,

हर साँझ को कहता है पंकज,

हम कैसे मिले मीत गया,

क्या सोच करे पागल मनवा,

जो बीत गया सो बीत गया,

इस झूठे खेल में, मूल्य ही क्या,

कोई हार गया कोई जीत गया,

क्या सोच करे पागल मनवा.....

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।