श्रीमन नारायण नारायण हरी हरी

पारंपरिक
विष्णु भगवान भजन विष्णु भजन vishnu
॥ पावन पाठ ॥

श्रीमन नारायण,,, जय जय नारायण,,,

स्वामी नारायण,,,

श्रीमन नारायण नारायण हरी हरी l

जय जय नारायण नारायण हरी हरी l

स्वामी नारायण नारायण हरी हरी l

तूँ है, सब का मोहन, प्यारे प्यारे, हरी हरी l

तुम देव हो,,, lll, सबसे न्यारे न्यारे, हरी हरी,,,

श्रीमन नारायण नारायण हरी हरी l

जय जय नारायण नारायण हरी हरी l

स्वामी नारायण नारायण हरी हरी l

देवकी नंदन, हे जग वंदन, 'मेरे भाग्य विधाता' l

अपने चरण का, दास बना के, 'मुक्ति दे सुख दाता' l

जाऊँ, चरणों पे तेरे, वारी वारी, हरी हरी,,,

श्रीमन नारायण नारायण हरी हरी,,,,,,,,,,,,,,,F

श्याम रंग में, रूप तुम्हारा, 'दिव्य सुदर्शन धारी' l

दर्शन से मन, प्रसन्न होता, 'तुम हो दशा अवतारी' l

कली, खिल गई मन की, सारी सारी, हरी हरी,,,

श्रीमन नारायण नारायण हरी हरी,,,,,,,,,,,,,,,F

तुम सूरज हो, तुम ही चन्द्रमा, 'मेरे किशन कन्हईया' l

नंदन वन में, तुमसा प्यारा, 'कोई नहीं रास रचईया' l

तेरे, खेल है सारे, न्यारे न्यारे, हरी हरी,,,

श्रीमन नारायण नारायण हरी हरी,,,,,,,,,,,,,,,F

ब्रह्मा जी ने, श्रिष्टी रची, 'तुम बन गए पालनहारी' l

शँकर जी के, भोलेपन की, 'धुरा संभाली सारी' l

दुःख, हो जाए हमसे, परे परे, हरी हरी,,,

श्रीमन नारायण नारायण हरी हरी,,,,,,,,,,,,,,,F

पारस समझ के, चरण छुए जो, 'वो बन जाए सोना' l

राम तिहारी, छिपा हुआ है, 'सुंदर रूप सलोना' l

तूने, सब के संकट, हरे हरे, हरी हरी,,,

श्रीमन नारायण नारायण हरी हरी,,,,,,,,,,,,,,,F

हरी नाम से, हार गए सब, 'अविजित अत्याचारी' l

जीत सका न, कोई भी तुमसे, 'असुर अमंगलकारी' l

तेरे, नाम से भागे दुःख, सारे सारे, हरी हरी,,,

श्रीमन नारायण नारायण हरी हरी,,,,,,,,,,,,,,,F

मन से, जोड़ लिया तुमको, 'न रहा कोई मन में उदासी' l

ना मा मिट गई, काहे सब को, 'सुख शांति अविनाशी' l

दिल, तेरे ही नाम से, भरे भरे, हरी हरी,,,

श्रीमन नारायण नारायण हरी हरी,,,,,,,,,,,,,,,F

हमने देखा, तो यही लगा, 'तेरे चरणों में है,

मेरी ही जगह, मेरी ही जगह' l

पर मैं, सोचा तो यह जाना, 'बिन तेरे,

यहाँ पर, कोई न सगा, कोई न सगा' l

तूँ ही, प्रेम की वर्षा, करी करी, हरी हरी,,,

श्रीमन नारायण नारायण हरी हरी,,,,,,,,,,,,,,,F

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।