जहाँ जिनकी जटाओं में गंगा

पारंपरिक
महादेव भजन शिव भजन shiv
॥ पावन पाठ ॥

जहाँ जिनकी जटाओं में गंगा की,

बहती अविरल धारा,

अभिनंदन उन्हे हमारा,

अभिनंदन उन्हे हमारा,

जिनके त्रिनेत्र ने कामदेव को,

एक ही पल मारा,

अभिनंदन उन्हे हमारा.....

भीक्षुक बनकर डोले वन वन वो,

विशम्भर कहलाए,

देवों को दे अमृत घट वो,

खुद काल कूट पी जाए,

नर मुंडो कि माला को जिसने,

अपने तन पर धारा,

अभिनंदन उन्हे हमारा…..

विषधर सर्पों को धारण कर,

रखा है अपने तन पर,

दीनों के बंधु दया सदा,

करते हैं अपने जन पर,

देते हे उनको सदा सहारा,

जिसने उन्हें पुकारा,

अभिनंदन उन्हे हमारा…..

राघव की अनुपम भक्ति जिनके,

जीवन की आशाएं,

सतसंग रुपी सुमनों से,

सारी धरती को महकाए,

ज्ञानी भी जिनकी गूढ़ महिमा का,

पा ना सके किनारा,

अभिनंदन उन्हे हमारा……

जहाँ जिनकी जटाओं में गंगा की,

बहती अविरल धारा,

अभिनंदन उन्हे हमारा,

अभिनंदन उन्हे हमारा,

जिनके त्रिनेत्र ने कामदेव को,

एक ही पल मारा,

अभिनंदन उन्हे हमारा…..

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।