नीलकंठ पे गई थी बाबा का रंग चढ़ गया

पारंपरिक
महादेव भजन शिव भजन shiv
॥ पावन पाठ ॥

नीलकंठ पे गई थी बाबा का रंग चढ़ गया,

हरिद्वार मैं गई थी बाबा का रंग चढ़ गया,

सास न मैं ले गई है सुसरा भी संग चढ़ गया,

सास धोक मारै हे सुसरा तो मौधा पड़ गया,

पड़ गया पड़ गया पड़ गया हे हरिद्वार मैं रुक्का पड़ गया.....

जेठानी न मैं ले गई जेठा भी गैल्या चढ़ गया,

जेठानी धोक मारै हे जेठा तो मौधा पड़ गया,

पड़ गया पड़ गया पड़ गया हे हरिद्वार मैं रुक्का पड़ गया....

दोराणी न मैं ले गई है देवर भी गैल्या चढ़ गया,

जेठानी धोक मारै हे जेठा तो मौधा पड़ गया,

पड़ गया पड़ गया पड़ गया हे हरिद्वार मैं रुक्का पड़ गया.....

नंदी न पै ले गई हे नन्दोंईया गैल्या चढ़ गया,

नंदी धोक मारै हे नन्दोंईया तो मौधा पड़ गया,

पड़ गया पड़ गया पड़ गया हे हरिद्वार मैं रुक्का पड़ गया....

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।