ऊंचे पर्वत शंकर बसे

पारंपरिक
महादेव भजन शिव भजन shiv
॥ पावन पाठ ॥

ऊंचे पर्वत शंकर बसे मै शंकर दे संग,

नी मैं मारगई नी माए एहदी नित घोटदी भंग....

ऊंचे पर्वत बरफा पैंदीया ए बर्फानी बाबा,

ना कोई ऐथे महल चोपड़ी ना कुल्ली ना ढाबा,

ए ता नित धुनिया सेके बस्मा ला वे अंग,

नी मैं मारगई नी माए एहदी नित घोटदी भंग...

लोकी बीजे कनका छोले एह ने भंग दे बूटे,

सारे भूत प्रेत ने लैंदे विच नशे दे झूठे,

भर भर बाटे पी बे भोला हो जाए मस्त मलंग,

नी मैं मारगई नी माए एहदी नित घोटदी भंग...

मैनू सपा तो डर लगता ए माला गल विच पावे,

बड़े बड़े सिंगा नंदी ते चढ़ जावे,

लोकी देखन खड़ खड़ ए नू आखन ए भोले दे रंग,

नी मैं मारगई नी माए एहदी नित घोटदी भंग....

डम डम डमरू भम भम भोला ए सारा जग गावे,

एहडी महिमा कोई न समझे न कोई समझावे,

एह तिरलोकी नाथ नी माए जटा दे विच गंग,

नी मैं मारगई नी माए एहदी नित घोटदी भंग....

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।