दातया खोल दे तू मेरे भी नसीब को

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॥ पावन पाठ ॥

दातया खोल दे तू मेरे भी नसीब को,

तार दे तू दाता इस गरीब को,

खोल दे तू मेरे भी नसीब को....

तेरे दर आके दुख दिल के मैं रोता हूँ,

अश्कों से तेरे दाता चरणों को धोता हूँ,

गले से लगा लो बदनसीब को,

खोल दी तू मेरे भी नसीब को...

ज्योत मैं जगाऊँ तेरी सांझ सवेरे,

दूर करो दाता मेरे गम के अंधेरे,

भूलों ना अपने तुम अजीज को,

खोल दे तू मेरे भी नसीब को....

अपने भक्तों को दाता दे दो दिलासा,

भक्तों की पूरी कर दो दाता तुम आशा,

खोल दे तू मेरे भी नसीब को.....

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।