चला चली का खेला

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॥ पावन पाठ ॥

चलती चक्की देख कर दिया कबीरा रोये,

दो पाटन के बीच में साबुत बचा ना कोए,

दो दिन का जग में मेला सब चला चली का खेला,

दो दिन का जग में मेला चला चली का खेला....

कोई चला गया कोई जावे कोई गठड़ी बांध सिधावेजी,

कोई चला गया कोई जावे कोई गठड़ी बांध सिधावेजी,

कोई खड़ा तैयार अकेला रे,

कोई खड़ा तैयार अकेला,

चला चली का खेला खेला रे,

दो दिन का जग में मेला सब चला चली का खेला,

दो दिन का जग में मेला सब चला चली का खेला....

मात-पिता सूत नारी भाई अंत सहायक नाही,

मात-पिता सूत नारी भाई अंत सहायक नाही,

फिर क्यो भरता पाप का ठेला रे,

फिर क्यो भरता पाप का ठेला,

चला चली का खेला रे खेला रे खेला रे,

दो दिन का जग में मेला सब चला चली का खेला,

दो दिन का जग में मेला सब चला चली का खेला....

ये तो है नश्वर संसारा भजन को करले ईश का प्यारा,

ये तो है नश्वर संसारा भजन को करले ईश का प्यारा,

ब्रह्मानंद कहे सुन चेला रे,

ब्रह्मानंद कहे सुन चेला,

चला चली का खेला रे खेला रे खेला रे,

दो दिन का जग मे मेला सब,

चला चली का खेला,

दो दिन का जग मे मेला सब,

चला चली का खेला,

दो दिन का जग मे मेला सब,

चला चली का खेला,

दो दिन का जग मे मेला सब,

चला चली का खेला,

दो दिन का जग मे मेला सब,

चला चली का खेला......

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।