सत्यवान के संग में जो तू ब्याह रचावेगी

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॥ पावन पाठ ॥

सत्यवान के संग में जो तू ब्याह रचावेगी,

अरे ओ बेटी री तू सुख ना पावेगी....

वन वन में भटकत डोले कहा तू रहेगी,

मौसम की मार बेटी कैसे सहेगी,

एक बरस की उम्र है बाकी तू पछतावेगी,

अरे ओ बेटी री तू सुख ना पावेगी.....

सास ससुर है अंधे कैसे रहेगी,

खाने को दाने दाने तू तरसेगी,

अरे राज पाठ को छोड़ के बेटी लाज ना आवेगी,

अरे ओ बेटी री तू सुख ना पावेगी.....

एक से एक राजा तेरे पुजारी,

ब्याह करण का मन सबका है भारी,

अरे जंगल जंगल भटकत डोले दुःख तू पावेगी,

अरे ओ बेटी री तू सुख ना पावेगी.....

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।