शिरडी के साई रे

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॥ पावन पाठ ॥

शिरडी के साई,

शिरडी के साई रे,

कहाँ छुपे हो मेरी बा,

कहाँ छुपे हो मेरी बा,

काँटों के ऊपर सेज है मेरी,

काँटों के ऊपर सेज है मेरी,

बैरी हुआ संसार,

हो बैरी हुआ संसार,

कहाँ छुपे हो मेरी बा.....

लाखों की तुमने बिगड़ी बनायी,

क्यों फिर मेरी याद ना आयी रे,

अपने ही साये से डर लागे,

क्यों सुख मुझसे दूर ही भागे रे,

ग़मों की गठरी का अब मुझसे,

सहा ना जाए भार,

कहाँ छुपे हो मेरी बा,

कहाँ छुपे हो मेरी बा.....

आँसू बहाते बिती उमरिया,

तुम्हे क्यों हुयी ना इसकी खबरिया रे,

रगड़ रगड़ के घिस गया माथा,

दर्द में भीगी सुन ले गाथा रे,

फूलों से कोमल काया ऊपर,

बरस रहे अंगार,

कहाँ छुपे हो मेरी बा,

शिरडी के साई रे,

कहाँ छुपे हो मेरी बा,

कहाँ छुपे हो मेरी बा,

शिरडी के साई रे....

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।