मोहे कान्हा की याद सतावे

पारंपरिक
श्री कृष्ण भजन कृष्ण भजन krishna
॥ पावन पाठ ॥

मोहे कान्हा की याद सतावे, झराझर रोए रही मेरी अखियां.....

चिट्ठियां लिखी नहीं जाती कागज बिना,

मैंने दिल को कागज बनाया, झराझर रोम रही मेरी अखियां,

मोहे कान्हा की याद सतावे, झराझर रोए रही मेरी अखियां.....

चिट्ठियां लिखी नहीं जाती स्याही बिना,

असुयन की स्याही बनाई, झराझरा रोए रही मेरी अखियां,

मोहे कान्हा की याद सतावे, झराझर रोए रही मेरी अखियां.....

चिट्ठियां लिखी नहीं जाती कलम बिना,

मैंने उंगली की कलम बनाई, जरा जरा रोए रही मेरी अखियां,

मोहे कान्हा की याद सतावे, झराझर रोए रही मेरी अखियां.....

चिट्ठियां भेजी नहीं जाती डाक बिना,

सांसो की डाक बनाई, झराझर रोए रही मेरी अखियां,

मोहे कान्हा की याद सतावे, झराझर रोए रही मेरी अखियां.....

चिट्ठियां पढ़ी नहीं जाती ज्ञान बिना,

मैंने मधुवन की सूरत लगाई, झराझर रोए रही मेरी अखियां,

मोहे कान्हा की याद सतावे, झराझर रोए रही मेरी अखियां.....

मैंने सूरत लगाई वृंदावन की मेरी बहना,

जाय कान्हा से चिट्ठियां पढ़ाई, झराझर रोए रही मेरी अखियां,

मोहे कान्हा की याद सतावे, झराझर रोए रही मेरी अखियां.....

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।