बल्ले बल्ले मैं दाता दा फ़क़ीर हो गया

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

बल्ले बल्ले मैं दाता दा फ़क़ीर हो गया,

ओहदे रंगां विच रंगी तस्वीर हो गया....

नाम वाले रंग विच मैनू दिता रंग ऐ,

इस तों इलावा मेरी कोई ना मंग ऐ,

मिली नाम वाली दौलत अमीर हो गया,

बल्ले बल्ले मैं दाता दा फ़क़ीर हो गया......

लोकी मैनू आखदे ने हो गया शुदाई ऐ,

अपनी ना होश, होश जग दी भुलाई ऐ,

उस शाहाँ दी वी, शाह दी जागीर हो गया,

बल्ले बल्ले मैं दाता दा फ़क़ीर हो गया......

अपनी खुमारी अंग-अंग विच भरती,

दास ते वी दाता ने नज़र ऐसी करती,

पाक रूह होई पावन शरीर हो गया,

बल्ले बल्ले मैं दाता दा फ़क़ीर हो गया......

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।