म्हारा पियर में साहिबा

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

म्हारा पियर में साहिबा,

बोई गणगौर,

आसि बोल रही कोयलिया,

नाचि रया मोर,

म्हारा पियर म साहिबा,

बोई गणगौर...

मैया और बाबुल की,

याद घनी आव,

याद घनी आव,

मख चैन नहीं आव,

म्हारा बाबुल का आंगन में,

नाच रया मोर,

म्हारा पीहर म साहिबा,

बोई गणगौर...

भाई कीरसानिया की,

याद घनी आव,

याद घनी आव,

मख चैन नहीं आव की,

रसानिया का आंगन में,

नाचीरया मोर,

म्हारा पीहर म साहिबा,

म्हारा पीहर म साहिबा,

बोई गणगौर....

भाई झमरालिया की,

याद घनी आव,

याद घनी आव मख,

चैन नहीं आव,

झमरालिया का आंगन में,

नाचीरया मोर,

म्हारा पीहर म साहिबा,

बोई गणगौर....

भाई सुनारया की,

याद घनी आव,

याद घनी आव मख,

चैन नहीं आव,

सुनारया का आंगन में,

नाचीरया मोर,

म्हारा पीहर म साहिबा,

बोई गणगौर....

संग की सहेली की,

याद घनी आव,

याद घनी आव मख,

चैन नहीं आव,

म्हारी सखियन का आंगन में,

नाचीरया मोर,

म्हारा पीहर म साहिबा,

बोई गणगौर...

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।