होली खेले हारावाले जी सग संतों की टोली

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

होली खेले हारावाले जी सग संतों की टोली,

होली खेले हारावाले जी सग भगतो की टोली,

संतों की टोली सब भक्तों की टोली,

भर भर मारे पिचकारी जी सब संतो की टोली,

होली खेले हारावाले जी सग संतों की टोली.....

भर भर झोली रंग लुटाए,

हारा वाले तो बल्ल-बल्ल जाए,

भगती दा रंग लूट आए रे,सब संतो की टोली,

होली खेले हारावाले जी सग संतों की टोली....

तक तक मारे रंग पिचकारी,

भीग गई रे आज संगत सारी,

भर भर मारे पिचकारी जी सब संतो की टोली,

होली खेले हारावाले जी सग संतों की टोली....

भगत तेरे सब नाचे गाए,

होली अपने प्रभु संग मनाए,

ऐसा छाया है आज रंग जी सब संतो की टोली,

होली खेले हारावाले जी सग संतों की टोली,

होली खेले हारावाले जी सग भगतो की टोली....

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।