आखिर मेरा काम हुआ हैं नाकोड़ा दरबार मे

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॥ पावन पाठ ॥

काम कोई भी कर नहीं पाया, घूम लिया संसार में,

आखिर मेरा काम हुआ हैं नाकोड़ा दरबार मे,

दादा, मेरे दादा, मेरे दादा, दादा,

तेरा और मेरा, जन्मो का हैं नाता.....

जब जब मैंने नाम लिया, दादा ने हर एक काम किया,

नैय्या जब जब डोली हैं, उसने आकर के थाम लिया,

बारह महीने मनती दीवाली, बारह महीने मनती दीवाली,

अब मेरे परिवार में,

आखिर मेरा काम हुआ हैं नाकोड़ा दरबार मे...

क्या कहना दरबार का, ये साचा दरबार निराला हैं,

शीश झुकाकर देख जरा, फिर बेड़ा पार तुम्हारा हैं,

तेरा संकट दूर करेंगे, तेरा संकट दूर करेंगे,

दादा पहली बार में,

आखिर मेरा काम हुआ हैं नाकोड़ा दरबार मे...

इसके चरणों में तू झुक जा, काम तेरा हो जाएगा,

इसकी कृपा जो हो जाए, बैठा मौज उड़ाएगा,

फिर काहे को घूम रहा हैं, फिर काहे को घूम रहा हैं,

हर कोई दरबार में,

आखिर मेरा काम हुवा हैं नाकोड़ा दरबार मे...

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।