दादा तेरी तस्वीर सिरहाने रखकर सोते हैं

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

दादा तेरी तस्वीर सिरहाने रखकर सोते हैं,

यही सोचकर अपने दोनों नैन भीगोते है,

कभी तो तस्वीर से निकलोगे,

कभी तो भेरू दादा पिघलोगे....

हर आहट पर लगता मेरे दादा घर आये हैं,

हर बार मेरा दिल टुटा मेरी अँखियाँ भर आई हैं,

नींद न आये करवट बदल बदल कर सोते हैं,

यही सोचकर अपने दोनों नैन भीगोते है,

कभी तो तस्वीर से निकलोगे,

कभी तो भेरू दादा पिघलोगे....

जाने कब आ जाये हम आँगन रोज गुहारें,

दादा इस छोटे से घर का कोना कोना संवारे,

जिस दिन दादा नहीं आते जी भरकर रोते हैं,

यही सोचकर अपने दोनों नैन भीगोते है,

कभी तो तस्वीर से निकलोगे,

कभी तो भेरू दादा पिघलोगे....

यही सोचके घबराये क्या हम इसके हक़दार है,

जितना मुझको प्यार है क्या तुमको भी प्यार हैं,

यही सोचकर आँखे मसल मसल कर रोते हैं,

यही सोचकर अपने दोनों नैन भीगोते है,

कभी तो तस्वीर से निकलोगे,

कभी तो भेरू दादा पिघलोगे....

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।