कभी वीर बनके महावीर बनके

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

कभी वीर बनके महावीर बनके,

चले आना दर्श मोहे दे जाना।।

तुम ऋषभ रूप में आना,

तुम अजित रूप में आना,

संभवनाथ बनके,

अभिनंदन बनके,

चले आना दरश मोहे दे जाना,

कभीं वीर बनकें महावीर बनके,

चले आना दर्श मोहे दे जाना...

तुम चंद्र रूप में आना,

तुम शीतल रूप में आना,

श्रेयांसनाथ बनके,

वासुपूज्य बनके,

चले आना दरश मोहे दे जाना,

कभीं वीर बनकें महावीर बनके,

चले आना दरश मोहे दे जाना.....

तुम विमल रूप में आना,

तुम अनंत रूप में आना,

धर्मनाथ बनके,

शांतिनाथ बनके,

चले आना दरश मोहे दे जाना,

कभीं वीर बनकें महावीर बनके,

चले आना दरश मोहे दे जाना....

तुम कुंथु रूप में आना,

तुम अरह रूप में आना,

मल्लिनाथ बनके,

मुनिसुव्रत बनके,

चले आना दरश मोहे दे जाना,

कभीं वीर बनकें महावीर बनके,

चले आना दरश मोहे दे जाना....

नमिनाथ रूप में आना,

नेमिनाथ रूप में आना,

पार्श्‍वनाथ बनके,

वर्द्धमान बनके,

चले आना दरश मोहे दे जाना,

कभीं वीर बनकें महावीर बनके,

चले आना दरश मोहे दे जाना.....

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।