भर दे रे, गुरुदेव झोली भर दे, ना बहलाओ बातों में

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॥ पावन पाठ ॥

भर दे रे, गुरुदेव झोली भर दे, भर दे,

ना बहलाओ बातों में ।

भर दे रे, गुरुदेव झोली भर दे, भर दे,

ना बहलाओ बातों में ॥

दिन बीते, बीती रातें,

अपनी कितनी हुई रे मुलाकाते ।

तुझे जाना, पहचाना,

तेरे झुठे हुए रे सारे वादे ।

भूले रे, गुरुदेव तुम तो भूले, भूले,

क्या रखा हैं वादों में ॥

भर दे रे, गुरुदेव झोली भर दे, भर दे,

ना बहलाओ बातों में..

नादान हैं, अंजान हैं,

गुरु तू ही तो मेरा भगवान हैं ।

तुझे चाहु, तुझे पाऊ,

मेरे दिल का यही तो अरमान हैं ।

लेले रे, गुरुदेव अब तो लेले, लेले,

मेरा हाथ, हाथों में ॥

भर दे रे, गुरुदेव झोली भर दे, भर दे,

ना बहलाओ बातों में..

मेरी नैया, जीवन नैया,

पार कर दे तू बनके खिवैया ।

मुझे आस हैं, विश्वास हैं,

दादा तू ही हैं एक खिवैया ।

रोए रे, गुरुदेव सेवक रोए, रोए,

तेरी ही यादों में ॥

भर दे रे, गुरुदेव झोली भर दे, भर दे,

ना बहलाओ बातों में..

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।