बाबोसा मैं हूँ पतंग

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॥ पावन पाठ ॥

तर्ज - अफसाना लिख रही हूँ

बाबोसा मैं हूँ पतंग, तेरे हाथों में है डोर,

कही टूट नही जाये, ये डोर बड़ी कमजोर,

बाबोसा मैं हूँ पतंग...

तेरी मर्जी चाहे जैसे उड़ाये अम्बर में,

गर छोड़ दे तु मुझको तो कट जाऊं पलभर में,

तेरे दम पर उड़ती जाऊं, तू उड़ाये जिस ओर,

कही टूट नही जाये, ये डोर बड़ी कमजोर,

बाबोसा मैं हूँ पतंग...

तेरी मर्जी के बिना एक पत्ता न हिले,

बाबोसा तेरी हुकूमत सारी दुनिया में चले,

देखा न देव तुझसा बलवान न कोई ओर

कही टूट नही जाये ये डोर बड़ी कमजोर,

बाबोसा मैं हूँ पतंग...

कभी डोर न टूटेगी मुझको विशवास है,

तेरे हाथों उड़ती रहूँ में मेरे दिल की ये आस है,

दिलबर बिन बाबोसा रीना नही जग में ठोर,

कही टूट नही जाये ये डोर बड़ी कमजोर,

बाबोसा मैं हूँ पतंग...

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।