जीवन का कोई भरोसा नहीं

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॥ पावन पाठ ॥

माटी के पुतले इतना ना इतरा के चल,

तेरे जीवन का कोई भरोसा नहीं,

बूंद पानी के गिरते ही घुल जाएगा,

कच्चे बर्तन का कोई भरोसा नहीं,

माटी के पुतले...

मेरा मेरा ना कर कुछ यहां ना तेरा,

चार दिन का जहां में बसेरा तेरा,

पिंजरे का पंछी एक दिन निकल जाएगा,

मौत सौतन का कोई भरोसा नहीं,

माटी के पुतले...

सारा संसार यह स्वार्थ से भरा,

इस के लालच में हरगिज दीवाने ना आ,

गैर तो गैर अपने भी देंगे दगा,

दोस्त दुश्मन का कोई भरोसा नहीं,

माटी के पुतले....

माया ठगनी अदाएं दिखाती फिरे,

मोह माया में सबको फंसाती फिरे,

माया ने जाने कितनों को दी है दगा,

माया नागिन का कोई भरोसा नहीं,

बूंद पानी के गिरते ही घुल जाएगा,

कच्चे बर्तन का कोई भरोसा नहीं,

माटी के पुतले....

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।