सुजलां सुफलां

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॥ पावन पाठ ॥

सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्

शस्यशामलां मातरम् ।

शुभ्रज्योत्स्नापुलकितयामिनीं

फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीं

सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीं

सुखदां वरदां मातरम् ।।

वन्दे मातरम् ।

कोटि-कोटि-कण्ठ-कल-कल-निनाद-कराले

कोटि-कोटि-भुजैर्धृत-खरकरवाले,

अबला केन मा एत बले ।

बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीं

रिपुदलवारिणीं मातरम् ।।

वन्दे मातरम् ।

तुमि विद्या, तुमि धर्म तुमि हृदि,

तुमि मर्म त्वं हि प्राणा:

शरीरे बाहुते तुमि मा शक्ति,

हृदये तुमि मा भक्ति,

तोमारई प्रतिमा गडि मन्दिरे-मन्दिरे मातरम् ।।

वन्दे मातरम् ।

त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी

कमला कमलदलविहारिणी वाणी विद्यादायिनी,

नमामि त्वाम् नमामि कमलां

अमलां अतुलां सुजलां सुफलां मातरम् ।।

वन्दे मातरम् ।

श्यामलां सरलां सुस्मितां

भूषितां धरणीं भरणीं मातरम् ।।

वन्दे मातरम् ।।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।