श्रीलक्ष्मीमहिमाष्टकम्

पारंपरिक
श्री कृष्ण भजन दुर्गा भजन krishna
॥ पावन पाठ ॥

अनन्त श्रीविभूषित जगद्गुरु श्रीनिम्बार्काचार्यपीठाधीश्वर श्रीराधासर्वेश्वरशरणदेवाचार्य "श्री श्रीजी महाराज" द्वारा विरचित "श्रीलक्ष्मीमहिमाष्टकम्"

विष्णो: सदा श्रीचरणारविन्द-

संवाहनव्यस्तकरां प्रसन्नाम।

दिव्यम्बरां कोटिसुधांशुरूपां

पद्मालयां तां प्रणमामि लक्ष्मीम।।

इन्द्रादिदेवैरभिवन्द्यमानां

गन्धर्वगीतैरूपगीयमानाम्।

सद्भि: प्रसेव्यां विविधै: सुभक्तै:

पद्मालयां तां प्रणमामि लक्ष्मीम।।

अनन्तलावण्य वरेण्यरूपां

करीन्द्रवृन्दार्पितपुष्पमालाम्।

किरीटकेयूरविशोभमानां

पद्मालयां तां प्रणमामि लक्ष्मीम।।

सत्पात्रगेहं निजपादपद्मै-

र्नित्य पवित्रि प्रकरोति या वै।

सद्धर्मशीलैरिह सेवनीयां

पद्मालयां तां प्रणमामि लक्ष्मीम।।

जहाति दुश्शीलजनानशेषान-

गृह्णाति या धर्मविदो विशुद्धान।

ददाति सर्वं हरितत्परेभ्यः

पद्मालयां तां प्रणमामि लक्ष्मीम।।

ऐश्वर्यशक्तिं व्रजवल्लभस्य

प्रधानशक्तिं श्रियमर्चनीयं।

अनन्तशक्तिं हृदि धारणीयां

पद्मालयां तां प्रणमामि लक्ष्मीम।।

प्रवालमुक्तावलिशोभमाना-

मम्भोजमालारमणीयरूपाम्

नानाविधाssभूषणभूषिताङ्गीम्

पद्मालयां तां प्रणमामि लक्ष्मीम।।

सदा हरे: श्रीचरणारविन्दे

सेवारतां नित्यनवां प्रवीणाम्।

आनन्दकोषां वरदां विशालां

पद्मालयां तां प्रणमामि लक्ष्मीम।।

अर्थदं भक्तिदं दिव्यं श्रीलक्ष्मीमहिमाष्टकम्।

राधासर्वेश्वराद्येन शरणान्तेन निर्मितम्।।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।