हे निम्बार्क दीनबन्धो

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॥ पावन पाठ ॥

हे निम्बार्क दीनबंधो! सुन पुकार मेरी।

पतितन में पतित नाथ,शरण आयो तेरी।।

मात तात भगिनी भ्रात,परिजन समुदाई।

सब ही सम्बन्ध त्यागि,आयो सरनाई।।

काम क्रोध लोभ मोह,दावानल भारी।

निसिदिन हौं जरौं नाथ,लीजिये उबारी।।

अम्बरीष भक्त जानि,रक्षा करि धाई।

तेसै ही निज दास जानि,राखौ सरनाई।।

भक्तवछल नाम नाथ,वेदन में गायो।

"श्रीभट्ट" तव चरन परस,अभै दान पायो।।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।