गुरुजी बिना कोई काम ना आवे

संत कबीर
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॥ पावन पाठ ॥

( गुरु बिन माला फेरते, गुरु बिन करते दान,

गुरु बिन सब निष्फल गया, बाचो वेद पुरान। )

गुरु जी बिना कोई काम न आवे,

कुल अभिमान मिटावे है।

कुल अभिमान मिटावे हो साधो,

अरे सतलोक पहुँचावे है।

गुरु जी बिना कोई काम न आवे।

नारी कहे मैं संग चलूँगी,

ठगनी ठग ठग खाया है।

अंत समय मुख मोड़ चली है,

तनिक साथ नहीं देना है।

गुरु जी बिना कोई काम न आवे।

कौड़ी कौड़ी माया रे जोड़ी,

जोड़ के महल बनाया है।

अंत समय में थारे बाहर करिया,

उसमे रे रह नहीं पाया है।

गुरु जी बिना कोई काम न आवे।

अरे जतन तन कर सुन तो रे बाला,

वाका लाड़ अनेक लड़ाया है,

तन की ये लकड़ी तोड़ी लियो है,

लाम्बा हाथ लगाया है।

गुरु जी बिना कोई काम न आवे।

भाई बंधू थारे कुटुंब कबीला,

धोखे में जीव बंधाया है।

कहे कबीर सुनो भाई साधो,

कोई कोई पूरा गुरु बन्ध छुड़ाया है।

गुरु जी बिना कोई काम न आवे।

गुरु जी बिना कोई काम न आवे,

कुल अभिमान मिटावे है।

कुल अभिमान मिटावे हो साधो,

अरे सतलोक पहुँचावे है।

गुरु जी बिना कोई काम न आवे।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।