चलो चलिए गुरा दे दवारे

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

चलो चलिए गुरा दे दवारे,

दुख मिट जावनगे सारे,

भर लो झोलिया भगतो,

दाता बैठे खोल भंडारे,

चलो चलिए गुरा दे दवारे,

दुख मिट जावनगे सारे॥

लाखो भगत है तर गए दर तो,

गुरा ने लाखो तारे,

जो जो प्रेमी आए दर ते,

करदे वारे न्यारे,

भगता दे नाल गुरा ने लखा पापी तारे,

चलो चलिए गुरा दे दवारे,

दुख मिट जावनगे सारे......

भगत धयानु वागू नच नच दाता नू मनोणा,

आए असी वी गुरा दे मेले नचना ते आज गाऊना,

झुम झुम के मस्ती दे विच नचना प्रभु दे द्वारे,

चलो चलिए गुरा दे दवारे,

दुख मिट जावनगे सारे......

दासा ने आज संगता लई, ये अरदास है करनी,

दर ते आए भगता नू प्रभु, लालो अपनी अपनी चरणी,

संगता दे दाता जी करदो तुसी वारे न्यारे,

चलो चलिए गुरा दे दवारे,

दुख मिट जावनगे सारे......

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।