जीवन मरण को खेल म्हारा मनवा

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॥ पावन पाठ ॥

जीवन मरण को खेल म्हारा मनवा जीवन मरण को खेल,

हो थारी उमर चली रे जसी रेल म्हारा मनवा जीवन मरण को खेल॥

गर्भ वास मैं तो उल्टा टंगा यो कौन करार करीन तू आयो,

काटी नौ महीना की तूने जेल मारा मनवा जीवन मरण को खेल॥

गर्भ वास से तू बाहर आया भाई बंधु नम आशो लिपटायो,

जसोदावन को बेल मारा मनवा जीवन मरण को खेल॥

डली रे जवानी थारो आयो रे बुढ़ापो आयो रे बुढ़ापो,

पीछे लगीगो कुडापो हो तुख याद आव ना सब खेल॥

कहें जन सिंगा सुनो भाई साधु सुनो भाई साधु,

रे लगी गुरु चरनन में रेल मारा मनवा जीवन मरण को खेल॥

जीवन मरण को खेल म्हारा मनवा जीवन मरण को खेल,

हो थारी उमर चली रे जसी रेल म्हारा मनवा जीवन मरण को खेल॥

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।