मेरे मन में गुरूवर आये

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॥ पावन पाठ ॥

मेरे मन में गुरूवर आये,

मन मेरा पावन हुआ,

सुख ही सुख के बादल छाए,

समता का सावन हुआ।।

मेरे मन में गुरूवर आये।

भटका रहा मैं भव-भव में लेकिन,

गुरु की शरण न मिली,

अब जाके गुरु की वाणी सुनी है,

ज्ञान की ज्योत जली,

जिनवर की वाणी,

गुरूवर के मुख से,

लगती है ऐसी भली,

सुनकर के जिसको,

पुलकित हृदय में,

संयम की बगिया खिली,

भेद-ज्ञान के पुष्पों से मेरा,

जीवन मनभावन हुआ,

सुख ही सुख के बादल छाए,

समता का सावन हुआ।।

मेरे मन में गुरूवर आये....

मन में मेरे बस है एक इच्छा,

चरणों मे गुरु के रहूं,

गुरूवर को देखूं गुरूवर को सोचू,

गुरूवर ही मुख से कहूं,

गुरु ने जो मुझको,

राह दिखाई,

उस पर सदा ही चलूं,

गुरु मेरे एक दिन,

भगवन बनेंगे,

मैं भी उन्हीं सा बनूँ,

जिनवाणी की फैली सुगन्धी,

मन मेरा मधुवन हुआ,

सुख ही सुख के बादल छाए,

समता का सावन हुआ।।

मेरे मन में गुरूवर आये....

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।