मुझे मिल गया मन का मीत

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

मुझे मिल गया मन का मीत,

ये दुनियाँ क्या जाने ll

मेरी लगी गुरु संग प्रीत,

ये दुनियाँ क्या जाने l

*क्या जाने भई क्या जाने ll

मुझे मिल गया मन का मीत,

ये दुनियाँ क्या जाने l

मेरी लगी गुरु संग प्रीत,

ये दुनियाँ क्या जाने l

बाजी जब गुरुवर पे लगाई l

पलट गया पासा मेरे भाई ll

मेरी हार हो गई जीत,

ये दुनियाँ क्या जाने l

मुझे मिल गया मन,,,,,,,,,,,,F

प्रीतम ने खुद प्रेम जताया l

करके इशारा पास बुलाया ll

है प्रेम की उलटी रीत,

ये दुनियाँ क्या जाने l

मुझे मिल गया मन,,,,,,,,,,,,F

ताल अलग है राग अलग है l

ये वैराग अनुराग अलग है ll

मन गाए किसके गीत,

ये दुनियाँ क्या जाने l

मुझे मिल गया मन,,,,,,,,,,,,F

सत्संगी होकर जो सीखा l

काम क्रोध खोकर जो सीखा l

कैसा है ये संगीत,

ये दुनियाँ क्या जाने l

मुझे मिल गया मन,,,,,,,,,,,,F

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।