मेरी रूठ गई माँ काली को मनाऊँ कैसे

पारंपरिक
माता दुर्गा भजन दुर्गा भजन durga
॥ पावन पाठ ॥

मेरी रूठ गई माँ काली को मनाऊँ कैसे,

मनाऊँ कैसे रिझाऊ कैसे,

मेरी रूठ गई माँ काली को मनाऊँ कैसे॥

आस पास कही डेरा नही है,

डेरा नही है, कही डेरा नही है,

दूर कलकाता मैं जाऊं कैसे,

मेरी रूठ गई माँ काली को मनाऊँ कैसे॥

फूलो की माता माँ को भाती नही है,

भाती नही है, माँ को भाती नही है,

मुंडो की माला मैं लाऊं कैसे

मेरी रूठ गई माँ काली को मनाऊँ कैसे॥

लाल पीली चुनरी माँ को भाती नही है,

भाती नही है, माँ को भाती नही है,

काली चुनरिया मैं लाऊं कैसे,

मेरी रूठ गई माँ काली को मनाऊँ कैसे॥

गंगा का पानी माँ को अच्छा नही लगता,

अच्छा नही लगता, माँ को अच्छा नही लगता,

मदिरा का पान कराऊ कैसे,

मेरी रूठ गई माँ काली को मनाऊँ कैसे॥

नारियल की भेट माँ को भाती नही है,

भाती नही है, माँ को भाती नही है,

बकरे की भेट चढ़ाऊं कैसे,

मेरी रूठ गई माँ काली को मनाऊँ कैसे,

मनाऊँ कैसे रिझाऊ कैसे,

मेरी रूठ गई माँ काली को मनाऊँ कैसे॥

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।