वनिध्येशवरी स्तोतरम

पारंपरिक
महादेव भजन दुर्गा भजन shiv
॥ पावन पाठ ॥

निशुम्भ शुम्भ गर्जनी,

प्रचण्ड मुण्ड खण्डिनी,

बनेरणे प्रकाशिनी,

भजामि विन्ध्यवासिनी।

त्रिशूल मुण्ड धारिणी,

धरा विघात हारिणी,

गृहे-गृहे निवासिनी,

भजामि विन्ध्यवासिनी।

दरिद्र दुःख हारिणी,

सदा विभूति कारिणी,

वियोग शोक हारिणी,

भजामि विन्ध्यवासिनी।

लसत्सुलोल लोचनं,

लतासनं वरप्रदं,

कपाल-शूल धारिणी,

भजामि विन्ध्यवासिनी।

कराब्जदानदाधरां,

शिवाशिवां प्रदायिनी,

वरा-वराननां शुभां,

भजामि विन्ध्यवासिनी।

कपीन्द्न जामिनीप्रदां,

त्रिधा स्वरूप धारिणी,

जले-थले निवासिनी,

भजामि विन्ध्यवासिनी।

विशिष्ट शिष्ट कारिणी,

विशाल रूप धारिणी,

महोदरे विलासिनी,

भजामि विन्ध्यवासिनी।

पुंरदरादि सेवितां,

पुरादिवंशखण्डितम्‌,

विशुद्ध बुद्धिकारिणीं,

भजामि विन्ध्यवासिनीं.......

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।