मुझे माता मिल गईं थी

पारंपरिक
माता दुर्गा भजन दुर्गा भजन durga
॥ पावन पाठ ॥

मुझे माता मिल गईं थी, पहाड़ो पे चढ़ते चढ़ते,

पहाड़ो पे चढ़ते चढ़ते, पहाड़ो पे चढ़ते चढ़ते,

मुझे माता मिल गईं थी हो॥

अंधे से कह रही थी कभी आना मेरे भवन पे,

तुझे नेत्र मैं ही दुँगी, तुझे नेत्र मैं ही दुँगी,

गुफा में बैठे बैठे, गुफा में बैठे बैठे,

मुझे माता मिल गईं थी, पहाड़ो पे चढ़ते चढ़ते,

पहाड़ो पे चढ़ते चढ़ते, पहाड़ो पे चढ़ते चढ़ते,

मुझे माता मिल गईं थी हो॥

कोढ़ी से कह रही थी, कभी आना मेरे भवन पे,

तुझे काया मैं ही दुँगी, तुझे काया मैं ही दुँगी,

गुफा में बैठे बैठे, गुफा में बैठे बैठे,

मुझे माता मिल गईं थी, पहाड़ो पे चढ़ते चढ़ते,

पहाड़ो पे चढ़ते चढ़ते ,पहाड़ो पे चढ़ते चढ़ते,

मुझे माता मिल गईं थी हो॥

निर्धन से कह रही थी, कभी आना मेरे भवन पे,

तुझे माया मैं ही दुँगी, तुझे माया मैं ही दुँगी,

गुफा में बैठे बैठे, गुफा में बैठे बैठे,

मुझे माता मिल गईं थी, पहाड़ो पे चढ़ते चढ़ते गई थी,

पहाड़ो पे चढ़ते चढ़ते, पहाड़ो पे चढ़ते चढ़ते,

मुझे माता मिल गईं थी हो॥

बाँझन से कह रही थी, कभी आना मेरे भवन पे,

तुझे बेटा मैं ही दुँगी, तुझे बेटा मैं ही दुँगी,

गुफा में बैठे बैठे, गुफा में बैठे बैठे,

मुझे माता मिल गईं थी, पहाड़ो पे चढ़ते चढ़ते,

पहाड़ो पे चढ़ते चढ़ते, पहाड़ो पे चढ़ते चढ़ते,

मुझे माता मिल गईं थी हो॥

कन्या से कह रही थी, कभी आना मेरे भवन पे,

तुझे घर वर मैं ही दुँगी, तुझे घर वर मैं ही दुँगी,

गुफा में बैठे बैठे, गुफा में बैठे बैठे,

मुझे माता मिल गईं थी, पहाड़ो पे चढ़ते चढ़ते,

पहाड़ो पे चढ़ते चढ़ते, पहाड़ो पे चढ़ते चढ़ते,

मुझे माता मिल गईं थी हो॥

भगतो से कह रही थी, कभी आना मेरे भवन पे,

तुम्हे दर्शन मैं ही दुँगी, तुम्हे दर्शन मैं ही दुँगी,

गुफा में बैठे बैठे, गुफा में बैठे बैठे,

मुझे माता मिल गईं थी, पहाड़ो पे चढ़ते चढ़ते,

पहाड़ो पे चढ़ते चढ़ते, पहाड़ो पे चढ़ते चढ़ते,

मुझे माता मिल गईं थी हो॥

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।