मेरे सतगुरु प्यारे ना छोड़िए

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॥ पावन पाठ ॥

ना छोड़िए ना छोड़िए मेरे सतगुरु प्यारे ना छोड़िए,

मेरे साहेब प्यारे ना छोड़िए,

मेरे दाता प्यारे ना छोड़िए॥

अवगुण हारी गुण ना है कोई,

अवगुण हारी गुण ना है कोई,

अवगुण देख मैं अपने रोई,

ना खोलिए ना खोलिए,

मेरी पापो वाली गठरी ना खोलिए,

ना छोड़िए ना छोड़िए मेरे सतगुरु प्यारे ना छोड़िए,

मेरे साहेब प्यारे ना छोड़िए,

मेरे दाता प्यारे ना छोड़िए॥

गहरी नदिया नाव पुरानी,

गहरी नदिया नाव पुरानी,

तैर ना जानू मैं अज्ञानी,

ना डूबिए ना डूबिए,

मेरी नैया भवर में ना डूबिये,

ना छोड़िए ना छोड़िए मेरे सतगुरु प्यारे ना छोड़िए,

मेरे साहेब प्यारे ना छोड़िए,

मेरे दाता प्यारे ना छोड़िए॥

लख दुनिया घर तेरे आई,

लख दुनिया घर तेरे आई,

दर तेरे पे अलख जगाई,

सुन लीजिए सुन लीजिए,

मेरे अंदर वाली बाते सुन ली जिए,

ना छोड़िए ना छोड़िए मेरे सतगुरु प्यारे ना छोड़िए,

मेरे साहेब प्यारे ना छोड़िए,

मेरे दाता प्यारे ना छोड़िए॥

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।