मैंने ऐसा सतगुरु पाया है

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

मैंने ऐसा सतगुरु पाया है,

मेरा रोम रोम हर्षया है,

मैंने ऐसा सतगुरु पाया है,

मेरा रोम रोम हर्षया है॥

मैं तो बंद कली थी बागो की,

सतगुरु ने आज खिलाया है,

मेरा रोम रोम हर्षया है,

मैंने ऐसा सतगुरु पाया है,

मेरा रोम रोम हर्षया है॥

अन्धकार में मै तो पड़ी हुई,

सतगुरु ने दीप जलाया है,

मेरा रोम रोम हर्षया है,

मैंने ऐसा सतगुरु पाया है,

मेरा रोम रोम हर्षया है॥

मेरी बीच भवर में नाव पड़ी,

सतगुरु ने पार लगाया है,

मेरा रोम रोम हर्षया है,

मैंने ऐसा सतगुरु पाया है,

मेरा रोम रोम हर्षया है॥

मोह माया में मै तो फसी हुई,

सतगुरु ने फंद छुड़ाया है,

मेरा रोम रोम हर्षया है,

मैंने ऐसा सतगुरु पाया है,

मेरा रोम रोम हर्षया है......

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।