दो दिन की जिंदगी है दो दिन का मेला

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॥ पावन पाठ ॥

इस जगत सराए में मुसाफ़िर रहना दो दिन का,

रहना दो दिन का, रहना दो दिन का,

रहना दो दिन का मुसाफ़िर रहना दो दिन का,

क्यों वीरथा करे ग़ुमान मूरख इस धन और जोबन का,

नाहीं भरोसा पल का नाहीं भरोसा पल का,

यूँ ही मर जाएगा यूँ ही मर जाएगा।।

दो दिन की जिंदगी है दो दिन का मेला,

क्या लेके आया जगत में,

क्या लेके जाएगा,

दो दिन की जिंदगी है,

दो दिन का मेला।।

इस काया का है भाग,

भाग बिन पाया नहीं जाता,

करम बिना नसीब फ़ल,

तोड़ खाया नहीं जाता,

कहे सत्य नाम जग ये, झूठा झमेला,

दो दिन की जिंदगी है दो दिन का मेला,

दो दिन की जिंदगी है दो दिन का मेला,

क्या लेके आया जगत में,

क्या लेके जाएगा,

दो दिन की जिंदगी है,

दो दिन का मेला।।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।