हे कान्हा मोहें, बहुत सतावत तोरी अँखियाँ

पारंपरिक
श्री कृष्ण भजन कृष्ण भजन krishna
॥ पावन पाठ ॥

हे कान्हा मोहें, बहुत सतावत तोरी अँखियाँ,

हे कान्हा मोहें, बहुत सतावत तोरी अँखियाँII

चहुँ दिस में कहुँ ठौर नाही मोहें ,

मोरे पीछे पीछे , आवत तोरी अँखियाँ ,

हे कान्हा मोहें, बहुत सतावत तोरी अँखियाँ II

मेरो मन मॊदिर में ऐसो बसो है ,

मोहे हर पल लुभावत तोरी अँखियाँ ,

हे कान्हा मोहें, बहुत सतावत तोरी अँखियाँ,

त्रिभुवन में नाही कोऊ है ऐसो ,

जैसो तीर चलावत तोरी अँखियाँ ,

हे कान्हा मोहें, बहुत सतावत तोरी अँखियाँ II

भवसागर में भटक रहा हूँ ,

काहे नाही , पार लगावत तोरी अँखियाँ ,

हे कान्हा मोहें, बहुत सतावत तोरी अँखियाँ II

भजन रचना: ज्योति नारायण पाठक

वाराणसी

(मोब: ०९५९८०५०५५१)

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।