गुरु सा ज्ञान बताया

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

गुरु सा म्हाने ज्ञान बतायो रे, जग झूठ लखायो रे,

जग झूठ लखायो रे, आज म्हाने नेछो आयो,

गुरु सा ज्ञान बतायो रे, जग झूठ लखायो रे।

गुरु रैण अंधियारी रे, रजु सर्प निहारी रे,

रजु सर्प निहारी रे, भय लागो भारी रे,

गुरु सा म्हाने ज्ञान बतायो रे, जग झूठ लखायो रे,

जग झूठ लखायो रे, आत्मा में नेछो आयो।

मिरगा जल दिसे रे, कोई पिया ना पीसे रे,

कोई पिया ना पीसे रे, ज्यूँ विशिया विष रे,

गुरु सा म्हाने ज्ञान बतायो रे, जग झूठ लखायो रे,

जग झूठ लखायो रे, आत्मा में नेछो आयो।

रे गुरु सीप अनूपा रे, कोई भया ना भूपा रे,

कोई भया ना भूपा रे, कर जाण्या रूपा रे,

गुरु सा म्हाने ज्ञान बतायो रे, जग झूठ लखायो रे,

जग झूठ लखायो रे, आत्मा में नेछो आयो।

बँझिया सूत झूले रे, आकाशा फुले रे,

आकाशा फुले रे, सुन्दर ओ कदे ही ना भूले रे,

गुरु सा म्हाने ज्ञान बतायो रे, जग झूठ लखायो रे,

जग झूठ लखायो रे, आत्मा में नेछो आयो।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।