हे मना खुद को डुबो दे दाता के एहसास में

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॥ पावन पाठ ॥

हे मना खुद को डुबो दे,

दाता के एहसास में,

तू ही तू, सुमिरण ही हो हर,

आते जाते स्वाँस में,

हे मना खुद को डुबो दे ।

मैं हूँ ऊँचा, मैं हूँ सच्चा,

ना करो अहंकार रे,

साहिब के दरबार में तो,

चलता भक्ति प्यार रे,

काहे दौड़े रात दिन तू,

माया की तलाश में,

तू ही तू, सुमिरण ही हो हर,

आते जाते स्वाँस में,

हे मना खुद को डुबो दे ।

आए दुःख तो तू घबराए,

फिर प्रभु को याद करे,

याद ना करता इस मालिक को,

पल पल जो इमदाद करे,

प्रभु नहीं है दूर तुझसे,

है करनी विश्वास में,

तू ही तू, सुमिरण ही हो हर,

आते जाते स्वाँस में,

हे मना खुद को डुबो दे ।

निंदा, चुगली, बैर, नफरत,

ये नहीं शुभ कर्म हैं,

मेरी दौलत, मेरी शौहरत,

ये तो मन के भरम हैं,

सागर वो धनवान है,

नाम धन है पास में,

तू ही तू, सुमिरण ही हो हर,

आते जाते स्वाँस में,

हे मना खुद को डुबो दे ।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।