व्रजराजसुताष्टकम्

पारंपरिक
श्री कृष्ण भजन कृष्ण भजन krishna
॥ पावन पाठ ॥

नवनीरदनिन्दितकान्तिधरं

रससागरनागरभूपवरम् ।

शुभवङ्किमचारुशिखण्डशिखं

भज कृष्णनिधिं व्रजराजसुतम् ॥

भ्रुविशङ्कितवङ्किमशक्रधनुं

मुखचन्द्रविनिन्दितकोटिविधुम् ।

मृदुमन्दसुहास्यसुभाष्ययुतं

भज कृष्णनिधिं व्रजराजसुतम् ॥

सुविकम्पदनङ्गसदङ्गधरं

व्रजवासिमनोहरवेशकरम् ।

भृशलाञ्छितनीलसरोज दृशं

भज कृष्णनिधिं व्रजराजसुतम् ॥

अलकावलिमण्डितभालतटं

श्रुतिदोलितमाकरकुण्डलकम् ।

कटिवेष्टितपीतपटं सुधटं

भज कृष्णनिधिं व्रजराजसुतम् ॥

कलनूपुरराजितचारुपदं

मणिरञ्जितगञ्जितभृङ्गमदम् ।

ध्वजवज्रझषाङ्कितपादयुगं

भज कृष्णनिधिं व्रजराजसुतम् ॥

भृशचन्दनचर्चितचारुतनुं

मणिकौस्तुभगर्हितभानुतनुम् ।

व्रजबालशिरोमणिरूपधृतं

भज कृष्णनिधिं व्रजराजसुतम् ॥

सुरवृन्दसुवन्द्यमुकुन्दहरिं

सुरनाथशिरोमणिसर्वगुरुम् ।

गिरिधारिमुरारिपुरारिपरं

भज कृष्णनिधिं व्रजराजसुतम् ॥

वृषभानुसुतावरकेलिपरं

रसराजशिरोमणिवेशधरम् ।

जगदीश्वरमीश्वरमीड्यवरं

भज कृष्णनिधिं व्रजराजसुतम् ॥

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।